किसकी जिम्मेदारी? केंद्र से पूछताछ व राज्यों के बचाव से भारत का विद्युतीकरण नहीं होगा।

घरों को बिजली की आपूर्ति पर केंद्र और राज्यों की भूमिका पर सही जानकारी का अभाव देश के लोगों के बीच ग्रामीण विद्युतीकरण के मुद्दे पर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहा है।

किसकी जिम्मेदारी? केंद्र से पूछताछ व राज्यों के बचाव से भारत का विद्युतीकरण नहीं होगा।

जब कोई भी जानकारी हमारे देश की नियमावली ( भारत का संविधान ) की बुनियादी समझ के बिना प्रचारित की जाती है तो वह अराजकता की स्थिति उत्पन्न कर सकती है।

घरों को बिजली की आपूर्ति पर केंद्र और राज्यों की भूमिका पर सही जानकारी का अभाव देश के लोगों के बीच ग्रामीण विद्युतीकरण के मुद्दे पर भ्रम की स्थिति पैदा कर रहा है।

इसको समझने के लिए हम एक बल्ब और एक स्विच का उदाहरण लेते हैं। यदि राज्य बिजली वितरण कंपनी आपके घर मे बिजली दे रही है तो बल्ब और स्विच कुछ काम के है पर अगर बिजली की आपूर्ति ही सुनिश्चित नहीं है तो बल्ब और स्विच भी कुछ काम के नहीं है।

ठीक इसी तरह से, यदि एक गांव के विद्युतीकरण का कार्य केंद्र द्वारा किया जाता है, तो स्विच ऑन करने पर भी बल्ब केवल तभी प्रकाश दे पायेगा जब राज्य तारों के माध्यम से बिजली की सतत और निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।

जब आधारहीन जानकारी स्थापित माध्यमों द्वारा एक सामान्य व्यक्ति  को समझाने का प्रयास किया जाता है तो वह इन सभी पर आसानी से विश्वास कर लेता है । इसके अतिरिक्त विधानसभा चुनाव के समीप आने पर विद्युतीकरण की दिशा में लिए हुए निर्णायक कदमो को गलत ढंग से पेश करके, ग्रामीण विद्युतीकरण का मुद्दा केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार के खिलाफ राजनीतिक प्रचार का अस्त्र बन गया है।

उत्तर प्रदेश जैसी राज्य सरकार व उनके अधिकारियों द्वारा, विद्युतीकृत गाँवो में घरों में बिजली उपलब्ध न कराने के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराने के लिए मीडिया व अन्य माध्यमो के सहयोग से बड़े पैमाने पर लोगों को गुमराह करते हुए देखा गया है।

केंद्र की ओर से किए जा रहे ग्राम विद्युतीकरण के कार्यो  की गति में विघ्न डालने के लिए एक रिपोर्ट के माध्यम से यह बताया गया है कि “10,072 नव विद्युतीकृत गांवों के 92 फीसदी गांवो में घरों में बिजली प्रदान नहीं की गयी हैं।”

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उपरोक्त बयान को तथ्यात्मक रूप से बिल्कुल सही मानते हुए हम संविधान द्वारा बिजली को समवर्ती विषय के रूप में समझने का प्रयास करते हैं।

उस स्तिथि में इसका यह अर्थ है कि विद्युत उत्पादन व पारेषण का दायित्व केंद्र सरकार का है जबकि घरों में बिजली वितरण का दायित्व राज्य सरकार का है और इसलिए हमारे देश के प्रत्येक गांव व घर तक बिजली नहीं पहुंचने के लिए बिजली वितरण कंपनियों के साथ -साथ उनसे संबंधित राज्य सरकारें जिम्मेदार हैं।

इसको और आगे समझने के लिए यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि केंद्र सरकार ने अपनी दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (DDUGJY) के तहत 18,452 गांवों के विद्युतीकरण के लिए राज्यों को हजारों करोड़ रुपये (31 जुलाई , 2016 तक 42,392 करोड़ रुपये ) की मंजूरी दी है।

इस केंद्रीय धन के उपयोग से बिजली के बुनियादी ढांचे (खंभे व तारों) को खड़ा करने के लिए एजेंसियों की नियुक्ति की गयी हैं। एक बार बुनियादी ढांचा खड़ा होने के बाद इन खंभो व तारों में बिजली प्रवाहित करने की जिम्मेदारी राज्य बिजली वितरण कंपनी की होती हैं।

लेकिन यह बात यहीं खत्म नहीं होती है । उस राजनीती को समझते है जो की केंद्र द्वारा भारत के राज्यों में गांवों का विद्युतीकरण के कार्य करने की गति में अवरोध उत्पन्न करती है व बाधा बनकर खड़ी हुई है।

वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब राज्य सरकार केंद्र सरकार को आश्वासन देती है कि प्रत्येक गांव मे बिजली के लिए प्रदान की बुनियादी सुविधाओं के माध्यम से पूर्ण बिजली की आपूर्ति की जा रही है। क्योकि विद्युत की गुणवत्ता व सतत प्रवाह का दायित्व भी राज्यो के पास है इसलिए वह किसी भी समय विद्युत आपूर्ति रोकने के लिए स्वतंत्र है।

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IndiaSpend, एक वेबसाइट के अनुसार ग्रामीण उत्तर प्रदेश में विद्युतीकृत तीन चौथाई घरों में एक दिन में बिजली की आपूर्ति 12 घंटे से भी कम है। बिजली की आपूर्ति पर वास्तविक जानकारी प्रदान करने वाला केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय का एक एप्प विद्युत प्रवाह एक सराहनीय कदम है। इस एप्प से स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश सरकार बिजली नही खरीद रही है जिसके कारणवश गांवो को ही नही अपितु अधिकांश शहरों को भी बहुत कम बिजली मिल रही है।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि न केवल गांवो में अपितु बड़े शहरों व कस्बों में भी सभी घरों में नियमित व वैध बिजली की आपूर्ति नहीं हैं।

उदहारण के तौर पर रामकिशोर एक रिक्शा चालक, एक दिन में लगभग 200-250 रुपये व मासिक 6000-7500 रुपये कमाता है। इस छोटी राशि से वह परिवार के छह सदस्यों की देखरेख करता है व उत्तर प्रदेश के नोएडा मे एक कमरे में रहता है।

नोएडा (निश्चित रूप से एक गांव नहीं है) में उनके एक कमरे के घर मे अभी भी बिजली कनेक्शन नहीं है और अपने घर मे दो बल्ब व एक पंखा चलाने के लिए उसने अपने पड़ोसी बिलाल से तार खींचा हुआ है व इसके लिए वह बिलाल को खुशी से 800 रुपये मासिक देता है।

रामकिशोर का कहना है कि यहां ऐसे बहुत घर हैं जिनके पास या तो बिजली कनेक्शन नहीं हैं या इसी तरह अवैध तरीके की व्यवस्था (जुगाड़) से अपने घरों में बिजली उपयोग कर रहें हैं।

अब हम भारत के उत्तरी और मध्य भाग में मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा जैसे राज्यों में छोटे शहरों का रुख करते हैं। वहां पर सैकड़ों-हजारों घरों ने बिजली का कनेक्शन नहीं लिया हैं। वे या तो विभिन्न अवैध साधनो से बिजली का उपयोग कर रहें हैं या बिना बिजली के भी आनंदपूर्वक रह रहे हैं।

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इन राज्यों के किसी भी शहर में (उत्तर में दिल्ली से हरियाणा से पंजाब तक, दक्षिण में तमिलनाडु से कर्नाटक, पूर्व में बिहार व पश्चिम में महाराष्ट्र) आप आसानी से सैकड़ों घर ढूँढ सकते हैं जो कि बिना बिजली के जीवन यापन कर रहे हैं।

केंद्र सरकार ‘गरीबी रेखा से नीचे’ (बीपीएल) परिवारों को मुफ्त कनेक्शन के लिए योजना व धन उपलब्ध कराती हैं। यह गांवों और शहरों में अन्य वर्ग के घरों को बिजली कनेक्शन लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। लोग अवैध साधनों का सहारा न लें, यह राज्य वितरण कंपनी की जिम्मेदारी है।

इसलिए विद्युतीकृत घरों की गिनती करते समय व उंगली उठाने से पहले हमें जागरूक रहना चाहिए कि यह उंगली किसकी ओर संकेत करती है ।

Read this post in English: Whose Power is it anyway? Questioning the Centre and sparing the states won’t electrify India.

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Anupama Airy

Founder and Editor at EnergyInfraPost
Independent Journalist and Energy Expert.​ (Worked with leading mainline financial and national daily for 23 years.​)​ Also, Guest Contributor with busines​sinsider.in
Currently, Writing a Book for Penguin India Titled Greased Pole:How Politics and Lobbying Stifled India’s Energy Dreams. The author can be reached on anupama.airy@gmail.com (9810661825)​
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